अंदाज़े बयाँ
किसी की राह में दहलीज़ पर दिए न रखो,
किवाड़ सूखी हुई लकड़ियों के होते हैं। - बशीर बद्र
छोड़ दो तुम भी मुझे सबकी तरह,
रास्तों! मेरी कोई मंजिल नहीं । - वसीम बरेलवी
जब कश्ती साबित-ओ सालिम थी ,
साहिल की तमन्ना किसको थी ।
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर ,
साहिल की तमन्ना कौन करे । - जज़्बी
बरस के खुल गए आँसू निखर गयी है फिज़ा ,
चमक रहा है सरे शाम दर्द का तारा । -जावेद अख़तर
किसी की राह में दहलीज़ पर दिए न रखो,
किवाड़ सूखी हुई लकड़ियों के होते हैं। - बशीर बद्र
छोड़ दो तुम भी मुझे सबकी तरह,
रास्तों! मेरी कोई मंजिल नहीं । - वसीम बरेलवी
जब कश्ती साबित-ओ सालिम थी ,
साहिल की तमन्ना किसको थी ।
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर ,
साहिल की तमन्ना कौन करे । - जज़्बी
बरस के खुल गए आँसू निखर गयी है फिज़ा ,
चमक रहा है सरे शाम दर्द का तारा । -जावेद अख़तर


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